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Thought Of The Day

जापानी का झेन और चीन का च्यान यह दोनों ही शब्द ध्‍यान के अप्रभंश है। अंग्रेजी में इसे मेडिटेशन कहते हैं, लेकिन अवेयरनेस शब्द इसके ज्यादा नजदीक है। हिन्दी का बोध शब्द इसके करीब है। ध्यान का मूल अर्थ है जागरूकता, अवेयरनेस, होश, साक्ष‍ी भाव और दृष्टा भाव।

योग का आठवां अंग ध्यान अति महत्वपूर्ण हैं। एक मात्र ध्यान ही ऐसा तत्व है कि उसे साधने से सभी स्वत: ही सधने लगते हैं, लेकिन योग के अन्य अंगों पर यह नियम लागू नहीं होता। ध्यान दो दुनिया के बीच खड़े होने की स्थिति है।

ध्यान की परिभाषा : तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम।। 3-2 ।।-योगसूत्र अर्थात- जहां चित्त को लगाया जाए उसी में वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। धारणा का अर्थ चित्त को एक जगह लाना या ठहराना है, लेकिन ध्यान का अर्थ है जहां भी चित्त ठहरा हुआ है उसमें वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। उसमें जाग्रत रहना ध्यान है।

ध्यान का अर्थ : ध्यान का अर्थ एकाग्रता नहीं होता। एकाग्रता टॉर्च की स्पॉट लाइट की तरह होती है जो किसी एक जगह को ही फोकस करती है, लेकिन ध्यान उस बल्ब की तरह है जो चारों दिशाओं में प्रकाश फैलाता है। आमतौर पर आम लोगों का ध्यान बहुत कम वॉट का हो सकता है, लेकिन योगियों का ध्यान सूरज के प्रकाश की तरह होता है जिसकी जद में ब्रह्मांड की हर चीज पकड़ में आ जाती है।

क्रिया नहीं है ध्यान : बहुत से लोग क्रियाओं को ध्यान समझने की भूल करते हैं- जैसे सुदर्शन क्रिया, भावातीत ध्यान और सहज योग ध्यान। दूसरी ओर विधि को भी ध्यान समझने की भूल की जा रही है।

बहुत से संत, गुरु या महात्मा ध्यान की तरह-तरह की क्रांतिकारी विधियां बताते हैं, लेकिन वे यह नहीं बताते हैं कि विधि और ध्यान में फर्क है। क्रिया और ध्यान में फर्क है। क्रिया तो साधन है साध्य नहीं। क्रिया तो ओजार है। क्रिया तो झाड़ू की तरह है।

आंख बंद करके बैठ जाना भी ध्यान नहीं है। किसी मूर्ति का स्मरण करना भी ध्यान नहीं है। माला जपना भी ध्यान नहीं है। अक्सर यह कहा जाता है कि पांच मिनट के लिए ईश्वर का ध्यान करो- यह भी ध्यान नहीं, स्मरण है। ध्यान है क्रियाओं से मुक्ति। विचारों से मुक्ति।

आज का ध्यान

अपने प्रत्येक कर्म को होश पूर्वक देखें। द्रष्टा बनें। जो हो रहा है उसे केवल अनुभव करें

वास्तविक गुरू का बोध

दुनिया में तीन तरह के गुरु संभव हैं। एक तो जो गुरु कहता है:गुरु के बिना नहीं होगा। गुरु बनाना पड़ेगा। गुरु चुनना पड़ेगा। गुरु बिन नाहीं ज्ञान। यह सामान्य गुरु है। इसकी बड़ी भीड़ है। और यह जमता भी है। साधारण बुद्धि के आदमी को यह बात जमती है। क्योंकि बिना सिखाए कैसे सीखेंगे ? भाषा भी सीखते, तो स्कूल जाते। गणित सीखते, तो किसी गुरु के पास सीखते। भूगोल, इतिहास, कुछ भी सीखते हैं, तो किसी से सीखते हैं। तो परमात्मा भी किसी से सीखना होगा। यह बड़ा सामान्य तर्क है-थोथा, ओछा, छिछला-मगर समझ में आता है आम आदमी के कि बिना सीखाए कैसे सीखोगे। सीखना तो पड़ेगा ही। कोई न कोई सिखाएगा, तभी सीखोगे।

इसलिए निन्यानबे प्रतिशत लोग ऐसे गुरु के पास जाते हैं, जो कहता है, गुरु के बिना नहीं होगा।और स्वभावतः जो कहता है गुरु के बिना नहीं होगा, वह परोक्षरूप से यह कहता हैः मुझे गुरु बनाओ। गुरु के बिना होगा नहीं। और कोई गुरु ठीक है नहीं। तो मैं ही बचा। अब तुम मुझे गुरु बनाओ!

दूसरे तरह का गुरु भी होता है। जैसे बुद्ध हैं। वे कहते हैः गुरु हो ही नहीं सकता। गुरु करने में ही भूल है। बुद्ध को नास्तिक भी इसीलिए समझा गया। जैसे एक कहता हैः गुरु बिन नाहीं ज्ञान। वैसे बुद्ध कहते हैः गुरु संग नाही ज्ञान! गुरु से बचना। गुरु से बच गए, तो ज्ञान हो जाएगा। गुरु में उलझ गए, तो ज्ञान कभी नहीं होगा। सौ में बहुमत, निन्यानबे प्रतिशत लोगों को पहली बात जमती है। क्योंकि सीधी-साफ है। थोड़े से लोगों को दूसरी बात जमती है। क्योंकि अहंकार के बड़े पक्ष में है।

तो जिनको हम कहते हैं बौद्धिक लोग उनको दूसरी बात जमती है।सीधे-सादे लोगों को पहली बात जमती है।जिन्होंने खूब पढ़ा-लिखा है उन्हें दूसरी बात जमती है। क्योंकि उनको अड़चन होती है किसी को गुरु बनाने में। कोई उनसे ऊपर रहे, यह बात उन्हें कष्ट देती है। बुद्ध जैसे व्यक्ति को सुनकर वे कहते हैः अहा! यही बात सच है। तो किसी को गुरु बनाने की कोई जरूरत नहीं है! किसी के सामने झुकने की कोई जरूरत नहीं है ! उनके अहंकार को इससे बल मिलता है।

पहला जिस आदमी ने कहा कि गुरु बिन ज्ञान नाहीं; और उसने यह भी समझाया कि और सब गुरु तो मिथ्या ही हैं । केवल मैं ही सदगुरु हूं। और जिन्हें वह मिथ्यागुरु कह रहा है, वे सब भी कह रहे हैं कि और सब मिथ्या, ठीक मैं। तो गुरु के बिना ज्ञान नहीं हो सकता इस बात का ज्याद प्रयोग हुआ लोगों को गुलाम बना लेने के लिए। सारी दुनिया इस तरह गुलाम हो गयी। कोई हिंदू है; कोई मुसलमान है; कोई ईसाई है; कोई जैन है। ये सब गुलामी के नाम हैं। अलग-अलग नाम। अलग-अलग-ढंग! अलग-अलग कारागृह! मगर सब गुलामी के नाम हैं।तो पहली बात का शोषण गुरुओं ने कर लिया। उसमें भी आधा सच था। और दूसरी बात का शोषण शिष्यों ने कर लिया। उसमें भी आधा सच था।

पहली बात में आधा सच है कि गुरु बिन नाहीं ज्ञान। क्योंकि गुरु के बिना तुम साहस जुटा न पाओगे। जाना अकेले है। पाना अकेले है। जिसे पाना है, वह मिला ही हुआ है। कोई और उसे देने वाला नहीं है। फिर भी डर बहुत है, भय बहुत है, भयके कारण कदम नहीं बढ़ता अज्ञात में।

पहली बात सच है; – आधी सच है – कि गुरु के साथ सहारा चाहिए। उसका शोषण गुरुओं ने कर लिया। वह गुरुओं के हित में पड़ी बात। दूसरी बात भी आधी सच है। गुरु बिन नाही ज्ञान की बात ही मत करो, गुरु संग नहीं ज्ञान। क्यों ? क्योंकि सत्य तो मिला ही हुआ है, किसी के देने की जरूरत नहीं है। और जो देने का दावा करे, वह धोखेबाज है।सत्य तुम्हारा अपना है; निज का है; निजात्मा में है; इसलिए उसे बाहर खोजने की बात ही गलत है। किसी के शरण जाने की कोई जरूरत नहीं है। आशरण हो रहो। बात बिल्कुल सच है; पर आधी। इसका उपयोग अहंकारी लोगों ने कर लिया, अहंकारी शिष्यों ने। पहले का उपयोग कर लिया अहंकारी गुरुओं ने – कि गुरु के बिना ज्ञान नहीं होगा, इसलिए मुझे गुरु बनाओ। दूसरे का उपयोग कर लिया अहंकारी शिष्यों ने, उन्होंने कहाः किसी को गुरु बनाने की जरूरत नहीं है। हम खुद ही गुरु है। हम स्वयं ही गुरु हैं। कहीं झुकने की कोई जरूरत नहीं है।

बुद्ध अदभुत गुरु हैं। बुद्ध दोनों बातें कहते हैं। कहते हैः गुरु के संग ज्ञान नहीं होगा। और दीक्षा देते है! और शिष्य बनाते हैं! और कहते हैः किसको शिष्य बनाऊं ? कैसे शिष्य बनाऊं ? मैंने खुद भी बिना शिष्य बने पाया! तुम भी बिना शिष्य बने पाओगे। फिर भी शिष्य बनातें है।

बुद्ध बड़े उल्ट लगते हैं। यही उनकी महिमा है। उनके पास पूरा सत्य है। और जब भी पूरा सत्य होगा, तो विरोधाभासी होगा। जब पूरा सत्य होगा, तो संगत नहीं होगा। उसमें असंगति होगी। क्योंकि पूरे सत्य में दोनों बाजुएं एक साथ होंगी। बुद्ध की बात अतर्क्य होगी, तर्कातीत होगी, क्योंकि दो विपरीत छोरों को इकटठा मिला लिया है। बुद्ध ने सत्य को पूरा-पूरा देखा है। तो उनके सत्य में रात भी है, और दिन भी है। और उनके सत्य में स्त्री भी है, और पुरुष भी है, और उनके सत्य में जीवन भी है, और मृत्यु भी है। उन्होंने सत्य को जितनी समग्रता में देखा, उतनी ही समग्रता में कहा भी।

गुरु का एक ही अर्थ हैः तुम्हारी नींद को तोड़ देना। तुम्हें जगा देना, तुम्हारे सपने बिखर जाएं, तुम होश से भर जाओ। निश्चित ही काम कठिन है। और न केवल कठिन है बल्कि शिष्य को निरंतर लगेगा कि गुरु विघ्न डालता है। जब तुम्हें कोई साधारण नींद से भी उठाता है तब तुम्हें लगता है, उठाने वाला मित्र नहीं, शत्रु है। नींद प्यारी है। और यह भी हो सकता है कि तुम एक सुखद सपना देख रहे हो और चाहते थे कि सपना जारी रहे। उठने का मन नहीं होता। मन सदा सोने का ही होता है। मन आलस्य का सूत्र है। इसलिए जो भी तुम्हें झकझोरता है, जगाता है,बुरा मालूम पड़ता है। जो तुम्हें सांत्वना देता है, गीत गाता है, सुलाता है, वह तुम्हें भला मालूम पड़ता है। सांत्वना की तुम तलाश कर रहे हो, सत्य की नहीं। और इसलिए तुम्हारी सांत्वना की तलाश के कारण ही दुनिया में सौ गुरुओं में निन्यान्बे गुरु झूठे ही होते हैं। क्योंकि जब तुम कुछ मांगते हो तो कोई न कोई उसकी पूर्ति करनेवाला पैदा हो जाता है। असदगुरु जीता है क्योंकि शिष्य कुछ गलत मांग रहे हैं; खोजनेवाले कुछ गलत खोज रहे हैं। अर्थशास्त्र का छोटा-सा नियम है-‘मांग से पूर्ति पैदा होगी’। अगर हजारो, लाखों, करोड़ों लोगों की मांग सांत्वना की है तो कोई न कोई तुम्हें सांत्वना देने को राजी हो जाएगा। तुम्हारी सांत्वना की शोषण करने को कोई न कोई राजी हो जाएगा। कोई न कोई तुम्हें गीत गाएगा, तुम्हें सुलाएगा। कोई न कोई लोरी गानेवाला तुम्हें मिल जाएगा, जिससे तुम्हारी नींद और गहरी हो, सपना और मजबूत हो जाए।

जिस गुरु के पास जाकर तुम्हें नींद गहरी होती मालूम हो, वहां से भागना; वहां एक क्षण रूकना मत। जो तुम्हें झकझोरता न हो, जो तुम्हें मिटाने को तैयार न बैठा हो, जो तुम्हें काट ही न डाले, उससे तुम बचना। जीसस का एक वचन है कि लोग कहते हैं कि मैं शांति लाया हूं लेकिनमै तुमसे कहता हूं, मैं तलवार लेकर आया हूं। इस वचन के कारण बड़ी ईसाइयों को कठिनाई रही। क्योंकि एक ओर जीसस कहते हैं कि अगर कोई तुम्हारे एकगाल पर चांटा मारे, तुम दूसरा भी उसके सामने कर देना। जो तुम्हाराकोट छीन ले, तुम कमीज भी उसे दे देना। और जो तुम्हें मजबूर करे एक मील तक अपना वजन ढोने के लिए, तुम दो मील तक उसके साथ चले जाना। ऐसा शांतिप्रिय व्यक्ति जो कलह पैदा करना ही न चाहे, जो सब सहने को राजी हो, वह कहता है, मैं षंाति लेकर नहीं, तलवार लेकर आया हूं। यह तलवार किस तरह की है? यह तलवार गुरु की तलवार है। इस तलवार का उस तलवार से कोई संबंध नहीं, जो तुमने सैनिक की कमर पर बंधी देखी है। यह तलवार कोई प्रगट में दिखाई पड़ने वाली तलवारनहीं। यह तुम्हें मारेगी भी और तुम्हारे खून की एक बूंद भी न गिरेगी। यह तुम्हें काट भी डालेगी और तुम मरोगे भी नहीं। यहतुम्हें जलाएगी, लेकिन तुम्हारा कचरा ही जलेगा, तुम्हारा सोना निखरकर बाहर आ जाएगा। हर गुरु के हाथ में तलवार है। और जो गुरु तुम्हें जगाना चाहेगा, वह तुम्हें शत्रु जैसा मालूम होगा। फिर तुम्हारी नींद आज की नहीं, बहुत पुरानी है। फिर तुम्हारी नींद सिर्फ नींद नहीं है, उस नींदमें तुम्हारा लोभ, तुम्हारा मोह, तुम्हारा राग, सभी कुछ जुड़ा है। तुम्हारी आशाएं, आकांक्षाएं सब उस नींद में संयुक्त है। तुम्हारा भविष्य, तुम्हारे स्वर्ग, तुम्हारे मोक्ष, सभी उस नींद में अपनी जडों को जमाए बैठेहैं। और जब नींद टूटती है तो सभी टूट जाता है। तुम ध्यान रखना, तुम्हारी नींद टूटेगी तो तुम्हारा संसार ही छूटजाएगा ऐसा नहीं। जिसे तुमने कल तक परमात्मा जाना था वह भी छूट जाएगा। नींद में जाने गए परमात्मा की कितनी सच्चाई हो सकती है,? तुम्हारी दुकान तो छूटेगी, तुम्हारे मंदिर भी न बचेंगे। क्योंकि नींद में ही दुकान बनाई थी, नींद मे ही मंदिर तय किये गये थे। जब नींद की दुकान गलत थी तो नींद के मंदिर कैसे सही होंगे? तुम्हारी व्यर्थ की बकवास ही न छूटेगी, तुम्हारे शास्त्र भी दो कौड़ी के हो जाएंगे। क्योंकि नींद में ही तुमने उन शास्त्रों को पढ़ा था, नींद में ही तुमने उन्हें कठंस्थकिया था, नींद में ही तुमने उनकी व्याख्या की थी। और तुम्हारे दुकान पर रखे खाते-बही अगर गलत थे तो तुम्हारी गीता, तुम्हारी कुरान, तुम्हारी बाइबिल भी सही नहीं हो सकती। नींद अगर गलत है तो नींद का सारा फैलाव गलत है।

इसलिए गुरु तुम्हारी जब नींद छीनेगा तो तुम्हारा संसार ही नहीं छीनता, तुम्हारा मोक्ष भी छीन लेगा। वह तुमसे तुम्हारा धन ही नहीं छीनता, तुमसे तुम्हारा धर्म भी छीन लेगा। कृष्ण ने अर्जुन को गीता में कहाहैः सर्वधर्मान परित्यज्य-’तू सबधर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जा।’तुम हिंदू हो, गुरु के पास जाते ही तुम हिंदू न रह जाओगे। और अगर तुम हिंदू रह गए तो समझना गुरु झूठा है। तुम मुसलमान हो, गुरु केपास जाते ही तुम मुसलमान न रह जाओगे। अगर फिर तुम्हें मुसलमानियत प्यारी रही तो समझना,तुम गलत जगह पहुंच गए। तुम जैन हो, बौद्ध हो, या कोई भी हो, गुरु तुमसे कहेगा, ’सर्वधर्मान् परित्यज्य!‘ सब धर्म छोड़कर तू मेरे पास आ जा। धर्म तो अंधे की लकड़ी है। उससे वह टटोलता है। शास्त्र तो शब्द हैं। जो नहीं जानता, वह सिद्धान्तों से तृप्त होता है। गुरु के पास पहुँचकर तुम्हारे शास्त्र, तुम्हारे धर्म, तुम्हारी मस्जिद, मंदिर, तुम खुद,तुम्हारा सब छिन जाएगा। इसलिए गुरु के पास जाना बड़े से बड़ा साहस है।

बुद्ध ने कहा हैः- मेरे पास आना, लेकिन मुझसे बंध मत जाना। तुम मुझमें श्रद्धा बनाने का प्रयास करना , सिर्फ इसलिए कि मैं तुम्हारा भविष्य हूं, तुम भी मेरे जैसे हो सकते हो, इसकी सूचना हूं। तुम मुझे सम्मान दो, तो यह तुम्हारा बुद्धत्व को ही दिया गया सम्मान है, लेकिन तुम मेरा अंधानुकरण मत करना। क्योंकि तुम अंधे होकर सिद्धार्थ के पीछे चले तो बुद्ध कैसे हो पाओगे? बुद्धत्व तो खुली आंखों से उपलब्ध होता है, बंद आंखों से नहीं और बुद्धत्व तो तभी उपलब्ध होता है, जब तुम किसी के पीछे नहीं चलते, खुद के भीतर जाते हो।

कल्याण मित्र बुद्ध का शब्द है, गुरु के लिए। बुद्ध गुरु के शब्द के पक्षपाती नहीं, थोड़े विरोधी हैं। बुद्ध बड़े अनूठे मनुष्य हैं। वे कहते हैं कि गुरु शब्द विकृत हो गया है। हो भी गया है, उस दिन भी हो गया था। गुरुओं के नाम पर इतना व्यवसाय चला है- गुरुओं ने लोगों को कहीं पहुंचाया ऐसा तो मालूम नहीं होता है। कभी सौ गुरुओं में कोई एक गुरु होता होगा, निन्न्यानवे तो गुरु नहीं होते- सिर्फ गुरु-अभ्यास! इसलिए बुद्ध ने नया शब्द चुन लियाः कल्याण मित्र। बुद्ध ने अपने शिष्यों को कहा है कि मैं तुम्हारा कल्याण मित्र हूं। बुरे मित्रों की संगति न करें, न अधम पुरुषों की संगति करें। कल्याण मित्रों की संगति करें और उत्तम पुरुषों की संगति करें।...कल्याण मित्र का अर्थ हैः- जो पहुंच गया, जिसने शिखर पर घर बना लिया। जो एक तरफ से तुम्हारी भाषा भी समझता है और उधर से परमात्मा की भी। उत्तम पुरुष का अर्थ है, जो मार्ग पर है, लेकिन तुमसे आगे है, तुमसे श्रेष्ठतर है। तुमसे सुंदरतम है। उत्तम पुरुष का अर्थ है साधु। उत्तम परुष का अर्थ है थोड़ा तुमसे आगे। कम से कम उतना तो तुम्हें ले जा सकता है,कम से कम उतना तो तुम्हें खींच ले सकता है।

कल्याण मित्र वही है, जो तुम्हारे भीतर की मनःस्थिति को बदलने में सहयोगी हो जाता है। और यह तभी संभव है, जब वह तुमसे उपर हो, उत्तम पुरुष हो। यह तभी संभव है जब वह तुमसे आगे गया हो। जो तुमसे आगे नहीं गया है, वह तुम्हें कहीं ले जा न सकेगा। आगे ले जाने की बातें भी करे तो भी तुम्हें नीचे ले जाएगा। बुद्ध कहते हैं:- न कोई गुरु है, न कोई शिष्य है। न मैं तुम्हारा गुरु और न तुम मेरे शिष्य! मेरे पास सिखाने को कुछ भी नहीं हैं पर आओ, मैं तुम्हें सिखाऊं। गुरु की कोई जरूरत नहीं है पर आओ, मेरा सहारा ले लो। यह सर्वांगीण सत्य है, क्योंकि दोनों बातें इसमें आ गईं। इसमें गुरु-शिष्य भी आ गए, और गुरुता भी नहीं आई और शिष्य का अपूर्व नाता भी आ गया और नाता मोह भी नहीं बना। वह अंतरंग संबंध भी निर्मित हो गया, लेकिन उस अंतरंग संबंध में कोई गांठ नहीं पड़ी, कैद न बनी।

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